
अमलाई ओपनकास्ट माइन में करोड़ों के काम के बाद स्थानीय लोगों में नाराजगी, SECL से पूरे मामले की जांच की मांग
सोहागपुर। सोहागपुर इलाके में इन दिनों RKTC Infratech Limited के काम को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। अमलाई ओपनकास्ट माइन में कंपनी को ओवरबर्डन हटाने, कोयला निकालने, लोडिंग और परिवहन का बड़ा काम मिला है। कंपनी की वेबसाइट पर इस काम की लागत करीब 393.56 करोड़ रुपये बताई गई है।
काम बड़ा है, पैसा बड़ा है, लेकिन अब सवाल भी बड़े उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों और कुछ श्रमिकों का कहना है कि कंपनी के कामकाज को लेकर कई बातें ऐसी हैं, जिनकी सही तरीके से जांच होना जरूरी है।
कंपनी का काम या दलालों का बोलबाला?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि कंपनी और उसके प्रबंधन के बीच कुछ ऐसे लोग सक्रिय हैं, जो कंपनी के कामकाज में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। आरोप तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि कंपनी के मैनेजमेंट तक पहुंच बनाने और कई काम कराने में बिचौलियों की भूमिका बढ़ गई है।
कुछ लोगों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले निजी और राजनीतिक लोगों का भी कंपनी के कामकाज पर असर है। हालांकि इन आरोपों की अभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह जांच का विषय है कि आखिर कंपनी का काम नियम-कायदे से चल रहा है या फिर पर्दे के पीछे किसी और का खेल चल रहा है।
मजदूरों को क्या मिल रहा है?
सबसे बड़ा सवाल मजदूरों को लेकर है। खदान में दिन-रात मेहनत करने वाले श्रमिकों को क्या उनका पूरा वेतन मिल रहा है? उनकी ड्यूटी कितने घंटे की है? पीएफ और दूसरी सरकारी सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं? काम के दौरान सुरक्षा के पूरे इंतजाम हैं या नहीं?
स्थानीय स्तर पर इन सवालों को लेकर तरह-तरह की बातें सामने आ रही हैं। अगर मजदूरों को नियम के मुताबिक सुविधाएं नहीं मिल रही हैं तो यह सीधे तौर पर गंभीर मामला है।
खनन का काम कोई सामान्य काम नहीं है। यहां छोटी सी लापरवाही भी मजदूर की जान पर भारी पड़ सकती है। ऐसे में हेलमेट, जूते, जैकेट, दस्ताने, सुरक्षा प्रशिक्षण और दूसरी जरूरी सुविधाओं में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
SECL की निगरानी पर भी सवाल
अब सवाल सिर्फ कंपनी पर नहीं, बल्कि SECL की निगरानी व्यवस्था पर भी उठ रहा है। आखिर जिस कंपनी को करोड़ों रुपये का काम मिला है, उसके काम की निगरानी कौन कर रहा है?
क्या अधिकारी समय-समय पर मौके पर जाकर जांच करते हैं?
क्या मजदूरों की शिकायत सुनी जाती है?
क्या वेतन और पीएफ की जांच होती है?
क्या सुरक्षा इंतजामों का रिकॉर्ड देखा जाता है?
क्या कंपनी को दिए गए काम की शर्तों का पूरा पालन हो रहा है?
अगर यह सब हो रहा है तो फिर शिकायतें और चर्चाएं क्यों सामने आ रही हैं? और अगर नियमित जांच नहीं हो रही है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
राजनीतिक पहुंच का भी लगाया जा रहा आरोप
इलाके में यह चर्चा भी है कि कंपनी को स्थानीय स्तर पर कुछ प्रभावशाली लोगों का सहारा मिल रहा है। आरोप है कि राजनीतिक या निजी पहुंच के कारण कंपनी के कुछ मामलों में आसानी हो जाती है।
हालांकि इस बात की पुष्टि जांच के बिना नहीं की जा सकती। इसलिए जरूरत आरोप लगाने की नहीं, बल्कि पूरे मामले की जांच कराने की है। अगर आरोप गलत हैं तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। और अगर आरोप सही निकलते हैं तो फिर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।
मजदूरों से सीधे पूछे अधिकारी
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर SECL के बड़े अधिकारी वास्तव में सच्चाई जानना चाहते हैं तो सिर्फ दफ्तर में बैठकर कागज देखने से काम नहीं चलेगा। अधिकारियों को खदान में जाकर मजदूरों से सीधे बात करनी चाहिए।
मजदूरों से पूछा जाए कि उन्हें समय पर पैसा मिलता है या नहीं, पीएफ कटता है या नहीं, सुरक्षा सामान मिलता है या नहीं और काम के दौरान किसी तरह का दबाव तो नहीं बनाया जाता।
साथ ही कंपनी के रिकॉर्ड और ठेके की शर्तों की भी जांच होनी चाहिए।
सवाल बहुत हैं, जवाब जांच से ही मिलेगा
फिलहाल सोहागपुर में सबसे ज्यादा चर्चा इन्हीं सवालों की है कि RKTC का काम नियम से चल रहा है या नहीं? मजदूरों को पूरी वैधानिक सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं? SECL कंपनी की सही तरीके से निगरानी कर रहा है या नहीं? और क्या किसी राजनीतिक या निजी प्रभाव के चलते कंपनी को फायदा पहुंच रहा है?
इन सवालों का जवाब अभी साफ नहीं है। लेकिन करोड़ों रुपये के काम से जुड़े इस मामले में सवाल उठना अपने आप में गंभीर बात है। अब लोगों की नजर SECL के उच्च अधिकारियों पर है कि वे मामले की निष्पक्ष जांच कराते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों और चर्चाओं तक ही सीमित रह जाता है।
