
हाईकोर्ट ने कहा- खसरा नंबर 335 की तालाब भूमि पर निर्माण साबित नहीं हुआ, राजस्व जांच में खसरा 314 पर मिला निर्माण
जैतहरी/जबलपुर। जैतहरी नगर के वार्ड क्रमांक 3 में बस स्टैंड के सामने गौरव पथ के पास निर्माणाधीन छह दुकानों को तालाब की जमीन पर बनाए जाने का आरोप लगाकर दायर जनहित याचिका को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये की लागत भी लगाई है। साथ ही, अंतरिम आदेश के कारण निर्माण में देरी से प्रतिवादी को हुए संभावित नुकसान की भरपाई के लिए कानून के अनुसार हर्जाना मांगने का रास्ता भी खुला रखा है।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने 2 सितंबर 2026 को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की पीठ ने विनय सिंह बनाम मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य मामले में यह आदेश पारित किया।
तालाब की जमीन पर निर्माण का लगाया था आरोप
याचिकाकर्ता विनय सिंह, अधिवक्ता एवं कांग्रेस नेता, ने जनहित याचिका के माध्यम से आरोप लगाया था कि जैतहरी के वार्ड नंबर 3 में खसरा नंबर 335, जिसका रकबा 0.955 हेक्टेयर है और जो राजस्व रिकॉर्ड में तालाब के रूप में दर्ज है, उसकी जमीन पर छह व्यावसायिक दुकानों का निर्माण कराया जा रहा है।
याचिका में निर्माण रोकने के साथ दुकानों के निर्माण से संबंधित 23 फरवरी 2024 की स्वीकृति और 14 अक्टूबर 2024 की तकनीकी स्वीकृति को निरस्त करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि तालाब की भूमि पर निर्माण से जल निकासी, स्वच्छता, पर्यावरण और जनस्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
प्रतिवाद में कहा गया- निर्माण तालाब वाले खसरे पर नहीं
मामले में प्रतिवादी क्रमांक 3 की ओर से इन आरोपों का विरोध किया गया। उनका कहना था कि छह दुकानों का निर्माण तालाब के रूप में दर्ज खसरा नंबर 335 पर नहीं, बल्कि खसरा नंबर 314 की भूमि पर किया जा रहा है।
प्रतिवादी के अनुसार निर्माण के लिए लगभग 5.50 मीटर × 20 मीटर क्षेत्र का उपयोग किया जा रहा है। खसरा नंबर 314 पर पहले से 33 दुकानें भी मौजूद हैं तथा वर्तमान निर्माण के लिए संबंधित स्तर से आवश्यक प्रस्ताव और तकनीकी स्वीकृति प्राप्त की गई है।
राजस्व निरीक्षण में खसरा नंबर 314 पर मिला निर्माण
भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए 29 मई 2025 को तहसीलदार जैतहरी के समक्ष स्थल निरीक्षण का आवेदन दिया गया। इसके बाद राजस्व निरीक्षक ने मौके का निरीक्षण कर पंचनामा तैयार किया।
राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट में निर्माण खसरा नंबर 314 पर होना पाया गया। जबकि जनहित याचिका में निर्माण को खसरा नंबर 335 की तालाब वाली भूमि पर बताया गया था।
कोर्ट ने कहा- याचिका का मुख्य आरोप साबित नहीं हुआ
हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध दस्तावेजों, पक्षकारों की दलीलों और राजस्व निरीक्षण की रिपोर्ट पर विचार किया। न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि छह दुकानों का निर्माण खसरा नंबर 335 की तालाब भूमि पर किया जा रहा है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप और तस्वीरें यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि निर्माण तालाब की भूमि पर हो रहा है। उपलब्ध राजस्व रिकॉर्ड और स्थल निरीक्षण की रिपोर्ट में निर्माण खसरा नंबर 314 पर पाया गया।
जनहित याचिका खारिज, ₹50 हजार की लागत
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने जनहित याचिका को आधारहीन पाते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये की लागत लगाई। यह राशि प्रतिवादी क्रमांक 3 को दिए जाने के निर्देश दिए गए हैं।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका खारिज होने से प्रतिवादी क्रमांक 3 के अन्य कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होंगे। यदि अंतरिम आदेश के कारण निर्माण कार्य में देरी हुई और इससे उसे आर्थिक नुकसान हुआ है, तो वह कानून के अनुसार सक्षम मंच के समक्ष हर्जाने की मांग कर सकता है।
इस प्रकार हाईकोर्ट ने फिलहाल हर्जाने की राशि तय नहीं की है, बल्कि प्रतिवादी को कानून के अनुसार दावा करने की स्वतंत्रता दी है।
निर्माण में देरी से नुकसान का दावा संभव
मामले में हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब निर्माण कार्य में हुई देरी से हुए संभावित आर्थिक नुकसान को लेकर प्रतिवादी पक्ष के लिए अलग से कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल गया है। हालांकि हर्जाने की वास्तविक राशि और उसकी वसूली का फैसला संबंधित सक्षम मंच द्वारा ही किया जाएगा।

