नगर परिषद बकहो के उपाध्यक्ष वैभव विक्रम सिंह ने 5 लाख की मांग के आरोपों को बताया झूठा, कहा— स्थानीय रोजगार, पर्यावरण और विस्थापितों के अधिकारों की लड़ाई से बौखलाई कंपनी
शहडोल/अमलाई।
शहडोल जिले के अमलाई क्षेत्र स्थित कोयला खदान परियोजना को लेकर चल रहा विवाद अब नया राजनीतिक और सामाजिक मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। निजी खदान संचालक कंपनी द्वारा नगर परिषद बकहो के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पर लगाए गए रंगदारी, धमकी और आर्थिक मांग के आरोपों को जनप्रतिनिधियों ने सिरे से खारिज करते हुए इसे एक सुनियोजित साजिश बताया है। उनका कहना है कि कंपनी स्थानीय जनता के अधिकारों और क्षेत्रीय विकास से जुड़े सवालों से बचने के लिए इस तरह के आरोपों का सहारा ले रही है।
नगर परिषद बकहो के उपाध्यक्ष वैभव विक्रम सिंह द्वारा जारी संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि उन्होंने और अन्य जनप्रतिनिधियों ने हमेशा क्षेत्र के लोगों की समस्याओं, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और विकास संबंधी मुद्दों को लोकतांत्रिक तरीके से उठाया है। कंपनी द्वारा लगाए गए आरोप न केवल तथ्यहीन हैं बल्कि उनकी सार्वजनिक छवि धूमिल करने का प्रयास भी हैं।
स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की मांग बनी विवाद की वजह?
जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि खदान क्षेत्र के आसपास रहने वाले स्थानीय युवाओं को रोजगार देने, सड़क और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं में सुधार करने तथा धूल और प्रदूषण की समस्या के निराकरण की मांग लंबे समय से उठाई जाती रही है। इसके बावजूद कंपनी प्रबंधन ने इन मांगों पर गंभीरता नहीं दिखाई।
प्रेस नोट के अनुसार, जब जनप्रतिनिधियों ने इन मुद्दों को लेकर आंदोलन और जनआंदोलन की चेतावनी दी, तब कंपनी ने दबाव की राजनीति अपनाते हुए उन पर रंगदारी मांगने और धमकी देने जैसे गंभीर आरोप लगाकर पूरे मामले का रुख बदलने की कोशिश की।
‘5 लाख रुपये प्रतिमाह मांगने’ का आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत
प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कंपनी द्वारा लगाए गए “5 लाख रुपये प्रतिमाह मांगने” के आरोप पूरी तरह झूठे, निराधार और मनगढ़ंत हैं। जनप्रतिनिधियों ने दावा किया कि उन्होंने कभी किसी प्रकार की आर्थिक मांग नहीं की। उनके सभी प्रयास केवल क्षेत्र के विकास, स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा और सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि यदि कंपनी अपने आरोपों को साबित नहीं कर पाती है तो वे कानूनी कार्रवाई करने के लिए बाध्य होंगे, ताकि सत्य सामने आ सके और जनता को वास्तविकता का पता चल सके।
पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के भी लगाए आरोप
जनप्रतिनिधियों ने खदान संचालन को लेकर कई गंभीर सवाल भी उठाए हैं। उनका आरोप है कि खदान क्षेत्र में पर्यावरणीय मानकों का समुचित पालन नहीं किया जा रहा है। भारी वाहनों की आवाजाही और खनन गतिविधियों के कारण आसपास के गांवों में धूल और प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ रही है, जिससे ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
इसके अलावा, विस्थापित परिवारों को उचित मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। जनप्रतिनिधियों का दावा है कि जब भी इन मुद्दों को उठाया जाता है, कंपनी जवाब देने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति शुरू कर देती है।
मानसिक दबाव और आत्मघाती आशंका के दावों पर भी उठाए सवाल
कंपनी द्वारा मानसिक तनाव और आत्मघाती आशंका संबंधी दावों पर भी जनप्रतिनिधियों ने सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इस प्रकार के बयान सहानुभूति प्राप्त करने और जांच की दिशा प्रभावित करने की रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि किसी पक्ष के पास ठोस प्रमाण हैं तो उन्हें प्रशासन और कानून के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि मीडिया के माध्यम से एकतरफा माहौल बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
निष्पक्ष जांच की मांग, प्रशासन पर टिकी निगाहें
जनप्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच से यह स्पष्ट हो जाएगा कि वास्तव में कौन सच बोल रहा है और क्या स्थानीय जनहित के मुद्दों को दबाने के लिए आरोपों का सहारा लिया जा रहा है।
उन्होंने प्रशासन से यह भी अनुरोध किया है कि खदान संचालन से जुड़े रोजगार, पर्यावरण और विस्थापन के मामलों की भी स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए, ताकि प्रभावित लोगों को न्याय मिल सके।
जनहित बनाम कॉर्पोरेट दबाव की बहस तेज
अमलाई का यह विवाद अब केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला धीरे-धीरे “जनहित बनाम कॉर्पोरेट दबाव” की बहस का रूप लेता जा रहा है। एक ओर कंपनी अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों को खारिज कर रही है, तो दूसरी ओर जनप्रतिनिधि स्थानीय अधिकारों और जनता की समस्याओं को केंद्र में रखकर संघर्ष का दावा कर रहे हैं।

