अनूपपुर।अनूपपुर जिले के ग्राम रक्सा, कोल्मी तथा आसपास के क्षेत्रों में प्रस्तावित 1,600 मेगावाट अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर परियोजना एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार विवाद का विषय परियोजना नहीं, बल्कि उससे जुड़ी जमीन, किसानों को मिले मुआवजे और बाद में हुए लगभग ₹211 करोड़ के कॉर्पोरेट अधिग्रहण का है। स्थानीय ग्रामीणों और किसान प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्षों पहले जिन किसानों ने विकास और रोजगार की उम्मीद में अपनी पुश्तैनी जमीन कंपनियों को बेची थी, उसी भूमि से जुड़ी परियोजना बाद में करोड़ों रुपये के कॉर्पोरेट सौदे का आधार बन गई, जबकि मूल भूमि मालिकों को उस आर्थिक वृद्धि का कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिला।स्थानीय स्तर पर यह मुद्दा तेजी से चर्चा का विषय बनता जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस समय भूमि क्रय की प्रक्रिया चली थी, उस दौरान उन्हें भविष्य में बड़े औद्योगिक विकास, स्थानीय युवाओं को रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, पेयजल तथा क्षेत्र के समग्र विकास के अनेक आश्वासन दिए गए थे। उनका आरोप है कि इन वादों का अपेक्षित स्तर पर पालन नहीं हुआ और कई परिवार आज भी रोजगार एवं पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं।उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेजों के अनुसार परियोजना के लिए आवश्यक कुल लगभग 341.85 हेक्टेयर भूमि में से लगभग 331.69 हेक्टेयर भूमि पहले से ही एक पूर्व औद्योगिक परियोजना के पास उपलब्ध थी। बाद में सितंबर 2025 में टोरेंट पावर लिमिटेड द्वारा न्यूजोन पावर प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड तथा न्यूजोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के स्वामित्व का अधिग्रहण किया गया। इस कॉर्पोरेट लेनदेन का घोषित मूल्य लगभग ₹211 करोड़ बताया गया है।दस्तावेजों के अनुसार न्यूजोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के पास अनूपपुर जिले में लगभग 922 एकड़ (करीब 371 हेक्टेयर) भूमि उपलब्ध थी। कॉर्पोरेट अधिग्रहण के तहत टोरेंट पावर ने न्यूजोन पावर प्रोजेक्ट्स के 100 प्रतिशत शेयर तथा न्यूजोन इंडिया के 49 प्रतिशत शेयर खरीदे। चूंकि न्यूजोन पावर के पास पहले से ही न्यूजोन इंडिया के 51 प्रतिशत शेयर थे, इसलिए इस लेनदेन के बाद दोनों कंपनियों और उनकी परिसंपत्तियों पर टोरेंट पावर का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।यहीं से स्थानीय किसानों के बीच यह प्रश्न उठने लगा कि यदि परियोजना और उससे जुड़ी परिसंपत्तियों का मूल्य वर्षों में इतना बढ़ गया, तो जिन किसानों ने शुरुआती दौर में अपनी कृषि भूमि बेची थी, उन्हें उस बढ़े हुए मूल्य का कोई लाभ क्यों नहीं मिला। कई ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों में उपलब्ध जानकारी और भविष्य के विकास के भरोसे अपनी पुश्तैनी जमीन बेच दी थी। आज जब उसी परियोजना से जुड़ी कंपनियों का करोड़ों रुपये में अधिग्रहण हुआ है, तब उन्हें लग रहा है कि उनकी भूमि का वास्तविक आर्थिक मूल्य कहीं अधिक था।हालांकि विधि विशेषज्ञ इस विषय को अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। उनका कहना है कि ₹211 करोड़ का यह लेनदेन किसानों की जमीन की दोबारा खरीद नहीं, बल्कि कंपनियों के शेयर और स्वामित्व के हस्तांतरण से संबंधित कॉर्पोरेट सौदा है। इसलिए कानूनी रूप से इसे भूमि विक्रय नहीं बल्कि शेयर अधिग्रहण माना जाएगा। इसके बावजूद यह प्रश्न सार्वजनिक चर्चा का विषय बन सकता है कि किसी परियोजना से जुड़े परिसंपत्ति मूल्य में वृद्धि का लाभ केवल निवेशकों और कंपनियों तक सीमित क्यों रहा तथा स्थानीय हितधारकों को उससे क्या लाभ मिला।ग्रामीणों का यह भी कहना है कि परियोजना के लिए भूमि देने वाले अनेक परिवारों के युवाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद थी। उनका आरोप है कि सीमित संख्या में ही स्थानीय लोगों को रोजगार मिला, जबकि अधिकांश लोगों को अपेक्षित अवसर नहीं मिले। कुछ किसान यह भी मांग कर रहे हैं कि यदि परियोजना अब नए चरण में आगे बढ़ रही है तो पहले भूमि देने वाले परिवारों को रोजगार और सामाजिक दायित्व (CSR) योजनाओं में प्राथमिकता दी जाए।सूत्रों के अनुसार परियोजना के विस्तार के लिए कुछ अतिरिक्त निजी भूमि की आवश्यकता भी बताई गई है। प्रशासन का कहना है कि यदि नई भूमि का अधिग्रहण किया जाता है तो उसका मुआवजा वर्तमान कानूनों, प्रचलित कलेक्टर गाइडलाइन तथा लागू वैधानिक प्रावधानों के अनुसार निर्धारित किया जाएगा। प्रशासनिक अधिकारियों का यह भी कहना है कि भूमि अधिग्रहण की प्रत्येक प्रक्रिया विधि सम्मत तरीके से पूरी की जाएगी।इस पूरे घटनाक्रम के बाद क्षेत्र में कई सवाल चर्चा में हैं—क्या पुराने भूमि सौदों में किसानों को पर्याप्त जानकारी दी गई थी? क्या रोजगार और पुनर्वास से जुड़े वादों का समुचित पालन हुआ? क्या सामाजिक दायित्वों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया? और क्या भविष्य में ऐसे बड़े औद्योगिक निवेशों में स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए नई नीति की आवश्यकता है?किसान प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि परियोजना से जुड़े पुराने मामलों की निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए, भूमि देने वाले परिवारों की वर्तमान स्थिति का सर्वे कराया जाए, रोजगार एवं पुनर्वास संबंधी वादों की प्रगति सार्वजनिक की जाए तथा यदि किसी स्तर पर किसानों के साथ अन्याय हुआ हो तो उन्हें कानून के अनुरूप उचित राहत प्रदान की जाए।दूसरी ओर, उद्योग जगत का मानना है कि बड़े कॉर्पोरेट अधिग्रहण निवेश, तकनीक और परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की सामान्य व्यावसायिक प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। ऐसे सौदे कंपनियों के मूल्यांकन, परिसंपत्तियों, लाइसेंस, अनुमतियों और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर किए जाते हैं।
जिन खेतों से उजड़े किसान, वही परियोजना बनी ₹211 करोड़ की कॉर्पोरेट डील का आधार”अनूपपुर में किसानों की जमीन से जुड़ा ₹211 करोड़ का कॉर्पोरेट सौदा! कम कीमत पर खरीदी गई भूमि बनी बड़ी डील, पुराने वादों और मुआवजे पर फिर उठे सवाल जमीन किसानों की… मुनाफा कंपनियों का! ₹211 करोड़ की डील पर उठे सवाल
