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हिंदी को लेकर महाराष्ट्र में उठा सियासी तूफान, वरिष्ठ शिक्षाविद जीतेन्द्र सिंह ने राष्ट्रपति को भेजा पत्रराजनीतिक रसूखदारों की साजिश करार, बोले– राष्ट्रीय एकता पर खतरा

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अनूपपुर (मप्र)।
महाराष्ट्र में हिंदी के खिलाफ बढ़ते विरोध और क्षेत्रीय भाषावाद के मुखर स्वर पर मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले अनूपपुर के जैतहरी निवासी वरिष्ठ समाजसेवी एवं शिक्षाविद जीतेन्द्र सिंह ने गहरी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे “राजनीतिक रसूख की साजिश” बताते हुए महामहिम राष्ट्रपति को पत्र भेजकर महाराष्ट्र में चल रहे हिंदी विरोधी प्रचार पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।

जीतेन्द्र सिंह ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि भले ही भारत की कोई औपचारिक राष्ट्रभाषा नहीं है, किंतु हिंदी को संविधान के अनुच्छेद 343(1) के तहत संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। उन्होंने कहा कि हिंदी पूरे देश में सहजता से बोली और समझी जाने वाली भाषा है, ऐसे में महाराष्ट्र में कुछ राजनीतिक व्यक्तियों द्वारा हिंदी के खिलाफ जहरीले प्रचार, अपमानजनक टिप्पणियाँ और हिंसात्मक व्यवहार न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि देश की एकता और अखंडता के लिए भी गंभीर खतरा है।

हिंदी विरोध को बताया दुर्भावनापूर्ण साजिश
शिक्षाविद सिंह ने अपने पत्र में कहा कि दक्षिण भारत की भाषाओं—कन्नड़, तेलुगू इत्यादि—में भी संस्कृत का गहन प्रभाव है और वहाँ के लोग भी सहजता से हिंदी बोलते हैं। इसके विपरीत महाराष्ट्र में हिंदी को लेकर उठे विरोध के स्वर एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश का हिस्सा लगते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देकर श्रमिकों, व्यापारियों, कर्मचारियों व आम जनता को प्रताड़ित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

हिंदी, भारत की पहचान – वैश्विक स्तर पर भी समादृत
जीतेन्द्र सिंह ने यह भी स्मरण कराया कि संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने जब हिंदी में भाषण दिया था, तब पूरी दुनिया ने हिंदी की मिठास और प्रभाव को महसूस किया था। आज कई विदेशी भी हिंदी बोलने में रुचि रखते हैं और इसे मनोरम भाषा मानते हैं।

“राष्ट्रभाषा” का दर्जा अब तक क्यों नहीं?
जीतेन्द्र सिंह ने यह सवाल भी उठाया कि इतनी व्यापक स्वीकार्यता के बावजूद आज तक हिंदी को “राष्ट्रभाषा” का दर्जा क्यों नहीं मिल पाया। उन्होंने कहा कि भाषावाद का जहर फैलाकर कुछ राजनीतिक ताकतें राष्ट्रीय एकता को खंडित करने का प्रयास कर रही हैं, जिसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।

राष्ट्रपति से की हस्तक्षेप की मांग
अपने पत्र के अंत में जीतेन्द्र सिंह ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वे महाराष्ट्र में चल रहे हिंदी विरोधी अभियानों को तत्काल प्रभाव से रुकवाएं और ऐसे तत्वों के विरुद्ध सख्त कदम उठाए जाएं जो देश की भाषाई एकता को खंडित कर रहे हैं।

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