अनूपपुर (मध्यप्रदेश)जिले में Group-D पदों पर आउटसोर्स के ज़रिए हो रही भर्ती अब महज़ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। यह मामला धीरे-धीरे ऐसे बिंदु पर पहुँचता दिख रहा है, जहाँ संगठित नेटवर्क, अंदरूनी सेटिंग और सुनियोजित चुप्पी की बू आने लगी है।भर्ती को लेकर लगातार उठ रहे सवाल इस ओर इशारा कर रहे हैं कि यह कोई इक्का-दुक्का गड़बड़ी नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित तंत्र हो सकता है, जो लंबे समय से सक्रिय है। चर्चा है कि इस पूरे खेल को कुछ खास लोग नहीं, बल्कि एक पूरा सिंडिकेट संचालित कर रहा है, जिसमें अलग-अलग स्तरों पर जिम्मेदारियां बंटी हुई हैं।स्थानीय स्तर पर यह सवाल अब आम हो चला है कि क्या इस भर्ती को वही चेहरे नियंत्रित कर रहे हैं, जिनके उपनाम वर्षों से अलग-अलग विभागीय चर्चाओं में सामने आते रहे हैं—जैसे तिवारी, राय, शर्मा, गौतम, दीक्षित या फिर इनके पीछे कोई और नाम?हालांकि कोई भी नाम आधिकारिक रूप से सामने नहीं आया है, लेकिन बार-बार वही उपनाम चर्चा में आना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।सूत्र बताते हैं कि चयन प्रक्रिया से पहले और बाद में जिन मोबाइल कॉल्स, मैसेज और व्हाट्सऐप बातचीत का आदान-प्रदान हुआ, वही इस पूरे मामले की असली कड़ी हो सकती है। सवाल यह है कि यदि प्रशासन सच में दूध का दूध और पानी का पानी करना चाहता है, तो क्या भर्ती से जुड़े जिम्मेदार लोगों के मोबाइल फोन और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच नहीं होनी चाहिए?क्यों न यह स्पष्ट किया जाए कि—भर्ती से पहले किन-किन लोगों के बीच लगातार संपर्क रहा?किन नंबरों से पैसों की बातचीत हुई?चयन सूची जारी होने से पहले किन मोबाइलों पर “सेटिंग” से जुड़े संकेत मिले?यह भी हैरान करने वाला है कि अब तक “शिकायत नहीं आई” कहकर पूरा मामला ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की जा रही है, जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि बेरोज़गार युवा डर, दबाव और भविष्य खराब होने की आशंका के कारण सामने आने से कतरा रहे हैं। क्या शिकायत न होना, सब कुछ सही होने का प्रमाण माना जा सकता है?प्रशासन की चुप्पी, एजेंसी की सफाई और जिम्मेदार विभागों का बचावात्मक रवैया यह सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं यह चुप्पी किसी मजबूरी का नतीजा तो नहीं। यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो स्वतंत्र जांच, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की पड़ताल और प्रक्रिया की ऑडिट से क्यों बचा जा रहा है?अब सवाल सिर्फ भर्ती का नहीं रहा। सवाल यह है कि— क्या अनूपपुर में सिस्टम के भीतर बैठकर सिस्टम को ही खोखला किया जा रहा है?और अगर आज इस पर पर्दा डाला गया, तो कल यही सिंडिकेट और भी मज़बूत होकर सामने आएगा।प्रशासन के लिए यह आखिरी मौका है कि वह स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराए, वरना यह मामला जल्द ही जिले से निकलकर प्रदेश स्तर पर विश्वास के संकट में बदल सकता हैं ।
