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अध्यात्म जगत की दैदीप्यमान विभूति‘धारकुंडी महाराज’परम पूज्य श्री परमहंस स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज ब्रह्मलीन**

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अमरकंटक।पावन-पवित्र तीर्थ नगरी अमरकंटक स्थित श्री परमहंस धारकुंडी आश्रम के लिए यह अत्यंत शोकपूर्ण समाचार है कि अध्यात्म जगत के स्थितप्रज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ एवं युगद्रष्टा संत, ‘धारकुंडी महाराज’ के नाम से विख्यात परम पूज्य श्री परमहंस स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज ने अपने 102 वर्ष की दीर्घ तपस्वी आयु में पार्थिव देह का त्याग कर ब्रह्मलीन हो गए।यह जानकारी आश्रम के संत स्वामी श्री लवलीन महाराज ने दी। उन्होंने बताया किदिनांक 07 फरवरी 2026, शनिवार,तिथि (पंचांग अनुसार): फाल्गुन कृष्ण षष्ठी,समय: प्रातः 10:00 बजे,स्थान: मुंबईको स्वामी जी ने अपने स्थूल शरीर का त्याग कर ब्रह्म में लीन होना स्वीकार किया।परम पूज्य स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज, अनंत श्री विभूषित स्वामी श्री परमहंस स्वामी परमानंद जी महाराज के प्रथम स्थितप्रज्ञ शिष्य थे तथा श्री परमहंस आश्रम की सर्वोच्च आध्यात्मिक विभूति के रूप में सर्वत्र पूजित रहे। गुरुदेव की आज्ञा एवं आशीर्वाद से 22 नवंबर 1956 को उनका प्रथम आगमन धारकुंडी नामक वन्य क्षेत्र में हुआ, जहाँ उन्होंने कठोर तप, साधना एवं साधकों के मार्गदर्शन के माध्यम से लोककल्याणकारी धारकुंडी आश्रम की स्थापना की।जिस एकांत वन प्रदेश में स्वामी जी ने वर्षों तक साधना की, वही स्थान आज एक प्रसिद्ध तीर्थ के रूप में विकसित हो चुका है। वर्तमान में यहाँ सैकड़ों संत, विरक्त साधक एवं श्रद्धालु साधना, ध्यान एवं भजन में संलग्न रहते हैं। स्वामी जी को एक सिद्ध संत के रूप में भी जाना जाता था।सद्गुरुदेव भगवान, तपोनिधि, योगेश्वर, ब्रह्मनिष्ठ एवं युगद्रष्टा जैसे विशेषणों से अलंकृत स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज ने अपने 102 वर्षों के जीवन में अखंड साधना, वैराग्य एवं आत्मबोध की दिव्य ज्योति प्रज्वलित रखी। उनकी ओजस्वी वाणी, दिव्य दृष्टि और योगमय जीवन ने असंख्य संतों, साधकों एवं गृहस्थ भक्तों को आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर किया।उनका ब्रह्मलीन होना न केवल धारकुंडी आश्रम, बल्कि संपूर्ण संत समाज एवं सनातन धर्म के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वे सादगी, करुणा और उच्चतम आध्यात्मिक चेतना के सजीव प्रतीक थे।उनके स्नेही शिष्य मुन्ना उरमालिया (रीवा) ने भावुक स्वर में कहा—“गुरुदेव का भौतिक शरीर भले ही हमारे मध्य न रहा हो, किंतु उनकी शिक्षाएँ, उनकी करुणा और उनकी दिव्य चेतना युगों-युगों तक साधकों का मार्गदर्शन करती रहेंगी।”समाधि कार्यक्रमप्राप्त जानकारी के अनुसार परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान की समाधि का निर्माण कार्य पूर्व में ही उनके निर्देशानुसार विरक्त संतों, साधकों एवं भक्तों के सहयोग से पूर्ण कर लिया गया था।समाधि कार्यक्रमस्थान : श्री परमहंस आश्रम, धारकुंडी (सतना)में विधिवत रूप से संपन्न किया जाएगा। इस अवसर पर सभी शिष्य, भक्त एवं प्रेमीजन अंतिम दर्शन कर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।

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