अनूपपुर।रामपुर बटूरा मेगा प्रोजेक्ट (कोल माइंस) के शुरू होने के बाद से आसपास के ग्रामीण इलाकों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। ग्राम बैरिहा निवासी कृषक एवं सामाजिक कार्यकर्ता अखिलेश त्रिपाठी ने प्रेस वार्ता में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि खदान शुरू होते ही गांव की हालत बद से बदतर हो गई है। आज स्थिति यह है कि ग्रामीणों को न तो पीने का शुद्ध पानी मिल पा रहा है और न ही खेती से भरपेट भोजन की व्यवस्था रह गई है।अखिलेश त्रिपाठी के अनुसार कोल माइंस के चलते खेती का उत्पादन 30 से 40 प्रतिशत तक गिर चुका है। सिंचाई के प्रमुख साधन — कुएं, हैंडपंप, बोर और तालाब — लगभग पूरी तरह सूख चुके हैं। आदिवासी मोहल्ले में पीने के पानी की समस्या सबसे विकराल रूप ले चुकी है, जहां महिलाएं और बच्चे दूर-दूर से पानी लाने को मजबूर हैं।उन्होंने बताया कि गांव के स्कूल की हालत भी बेहद चिंताजनक है। भारी वाहनों की आवाजाही और कंपन के कारण भवन जर्जर हो चुका है और किसी भी दिन बड़ा हादसा हो सकता है। बच्चों की जान हमेशा खतरे में बनी हुई है।प्रदूषण को लेकर भी ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। बैरिहा क्षेत्र में शायद ही कोई पेड़-पौधा ऐसा बचा हो जिस पर कोयले की काली परत न जमी हो। घरों की छतों और सड़कों पर कोयले की धूल ऐसे जम जाती है मानो डामर बिछा दिया गया हो। सांस लेना तक दूभर हो गया है, लेकिन प्रबंधन इस गंभीर समस्या से आंखें मूंदे बैठा है।पूर्व जनपद सदस्य राजबहोर चंद्रा ने सड़क सुरक्षा को लेकर प्रबंधन पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि रामपुर से आंचल वाटिका तक आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। सड़क किनारे पटरी भराव न होने और ओवरलोड भारी वाहनों की तेज रफ्तार आवाजाही इसकी सबसे बड़ी वजह है। एसईसीएल के सीएसआर फंड से आज तक सड़क सुधार के नाम पर एक ट्रॉली मिट्टी तक नहीं डाली गई।उन्होंने बताया कि जाम और दुर्घटनाओं की स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि कई बार एंबुलेंस तक समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाती। कई लोगों की जान सड़क हादसों में जा चुकी है, जिसकी जानकारी प्रबंधन को पूरी तरह है, फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही।राजबहोर चंद्रा ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि जल्द ही सड़क के किनारे पटरी भराव, स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था और भारी वाहनों के लिए पार्किंग की सुविधा नहीं की गई, तो ग्रामीण उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे। यह आंदोलन एक-दो दिन का नहीं, बल्कि महीनों तक चल सकता है।अखिलेश त्रिपाठी ने भी दो टूक शब्दों में कहा कि रामपुर से बैरिहा तक सड़क मरम्मत, बिजली और पानी की मूलभूत समस्याओं पर यदि शीघ्र ध्यान नहीं दिया गया, तो ग्रामीण प्रबंधन और प्रशासन दोनों के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। अब यह लड़ाई सीधे ग्रामीण बनाम प्रबंधन की होगी।ग्रामीणों का साफ कहना है कि विकास के नाम पर उनका जीवन तबाही की ओर धकेला जा रहा है। अगर समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में यह क्षेत्र बड़े आंदोलन का केंद्र बन सकता है।
